Neeraj Chopra ने देश के नाम किया Gold Medal, बाल काटने की वजह भी बताई

आज कहानी नीरज चोपड़ा की , नीरज चोपड़ा के ओलिंपिक के शानदार प्रदर्शन से 121 साल बाद भारत ने आख़िर एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक जीत लिया और स्वर्ण जीतकर उन्होंने ने देश का दिल भी जीत लिया। ओलंपिक्स के इतिहास में भारत की तरफ से वो एथलेटिक्स में स्वर्ण जीतने वाले पहले भारतीय बन गए।

आज वो मैडल जीतकर देश वापिस आ रहे हैं। तो लोग हर जानकारी को कुरेद कर ये जानना चाहते हैं कि आखिर उनकी कहानी क्या है ? 23 साल के नीरज चोपड़ा के एथलीट बनने की कहानी बेहद दिलचस्प है। नीरज पानीपत के एक छोटे से गाँव खँडरा के एक संयुक्त परिवार से तालुक रखते हैं जो एक मध्यमवर्गीय परिवार है।

नीरज अपने बचपन में आम बच्चों से ज्यादा मोटे और थुलथुले बदन वाले थे और उनकी इसी कमी ने उनको पूरी दुनिया में शौहरत दिलाई। दरअसल मोटापे को कम करने के लिए नीरज ने पानीपत सटेडियम जाना शुरू किया उस वक़्त नीरज का वजन 80 किलो हुआ करता था और नीरज हर हाल में अपना वजन काम करना चाहते थे।

उनके मोटापे और उसके ऊपर कुरता पायजामा पहनने की वजह से स्टेडियम में इन्हें लोगों ने सरपंच कहकर बुलाना शुरू कर दिया। नीरज ने कभी इसे मजाक के तौर पर नहीं लिया और वो अपना वजन कम करने के लिए लगातार मेहनत करते रहे। इसी बीच नीरज ने जेवलिन थ्रो की प्रैक्टिस कर रहे कई खिलाड़ियों को वहां देखा।

नीरज चोपड़ा जेवलिन फेंक रहे खिलाड़ियों के जेवलिन को बेहद चाव से दौड़ते हुए उसे उठाकर वापिस लाते और खिलाड़ियों को देते। एक तरफ नीरज का मोटापा कम हो रहा था और दूसरी तरफ जेवलिन थ्रो की तरफ उनकी ललक लगातार बढ़ती जा रही थी। एक दिन स्टेडियम में प्लेयर्स को जेवलिन सीखाने वाले कोच के सामने ही इन्होने वो भाला फेंका और कोच ने उन्हें ऐसा करते हुए उस वक़्त देख लिया।

कोच ने पाया की वो दूसरे खिलाडियों से बेहद अलग और कमाल के thrower हैं। कोच उनकी प्रतिभा से रूबरू हुए और नीरज का हौंसला बढ़ाया। कोच ने उनके परिवार से बात कर उन्हें जेवलिन थ्रो के खेल को अपनाने की सलाह भी दी।

उनके परिवार ने कोच की सलाह को मानते हुए नीरज को इस खेल में हाथ आजमाने की सलाह दी लेकिन मांगा खेल होने की वजह से उस समय नीरज के परिवार के पास जेवलिन थ्रो के जेवलिन को खरीदने के पैसे नहीं थे। इसके बाद परिवार ने जैसे तैसे 7000 का बंदोबस्त किया और उन्हें जेवलिन लाकर दिया , इसके बाद नीरज ने भी कभी पीछे उड़कर नही देखा।

वो सफलता के झंडे गाड़ते गए। उनके थ्रो की टेक्निक सबसे अलग थी। हालांकि उनके पास कोई कोच नहीं था और ऐसे में उन्होंने एक रास्ता निकाला। उन्होंने जेवलिन थ्रो के वीडियोज यूट्यूब से देखने शुरू किये और वो कमाल करने लगे। नीरज अब कई प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेने लगे , वर्ष 2016 में नीरज ने विश्व जूनियर चैंपियनशिप में 86.48 मीटर का थ्रो कर रिकॉर्ड बनाया।

इस के बाद दक्षिण एशिया खेलों में गुहावटी में 82. 23 मीटर थ्रो कर राष्ट्रीय रिकॉर्ड की प्राप्ति की। कॉमन वेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक अपने नाम किया। 2018 में जकार्ता में एशियाई खेलों 88.06 मीटर का थ्रो कर उन्होंने रिकॉर्ड बनाया। साल 2016 का वो समय जब भारत को गोल्ड दिलाने वाला ये लड़का राष्ट्रीय प्रदर्शन कर सामने आने की कोशिश कर रहा था।

इस साल में ही उन्हें पहली पहचान मिली जब पोलेंड में आयोजित अंडर 20 चैंपियनशिप में नीरज ने गोल्ड जीता। इसके बाद बारी थी अन्तराष्ट्रीय पहचान की , गोल्ड कोस्ट का भाला 86. 47 मीटर पर रुका। लोग उनमे उम्मीद खोजना शुरू करने लगे। उमीदों से आंधी बनकर नीरज चोपड़ा ने 2018 के राष्ट्रीयमंडल खेलों में अपने जेवलिन को 88.07 मीटर मारा जो राष्ट्रीय रिकॉर्ड बना लेकिन नीरज संतुष्ट नहीं थे।

उन्हें आगे बढ़ना था भारतीय सेना में जूनियर कमीशंड आफिसर होने से उन्हें इसके लाभ भी मिले और उन्हें वर्ल्ड क्लास ट्रेनिंग भी मिली जो शायद बाहर उन्हें संभव नहीं हो पाती। 2012 में एक बार बास्केट बॉल खेलत वक़्त उनकी कलाई टूटने के बाद के बार नीरज ने ये भी सोच लिया था

कि वो आगे जेवलिन थ्रो नहीं खेल पाएंगे पर नीरज ने इस बात को भी मात दी कि उनकी उसी कलाई की हड्डी टूटी थी जिससे वो स्वर्णिम थ्रो करके ओलिंपिक गोल्ड मैडल लाये हैं। साल 2019 नीरज चोपड़ा के लिए बेहद मुश्किलों वाला साल साबित हुआ। उन्हें कंधे की चोट लगी और वो आगे खेल नहीं पाए और सर्जरी के बाद उन्हें कई महीने तक आराम के लिए खेल से दूर होना पड़ा।

2020 नमे कोरोना के चलते अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं नहीं हुई और वो एक साल तक इस पल का इंतज़ार करते रहे। रियो ओलंपिक में क्वालीफाई करने से चुके नीरज ने टोक्यो ओलिंपिक में ऐसा नहीं होने दिया और अपनी पिछली चूक के घाव को भरते हुए उन्होंने वो कर दिखाया जो उनसे पहले किसी ने नहीं किया।

आखिर शनिवार को उन्होंने देश के खाते में स्वर्ण पदक डाल दिया। नीरज ने अपना ये पदक एथलीट मिल्खा सिंह के नाम किया जो अपने जीवन काल में किसी भारतीय युवा को ओलंपिक्स में गोल्ड मैडल लेते हुए देखना चाहते थे। हालांकि समय मिल्खा सिंह और नीरज दोनों के लिए इतना मेहरबान नहीं रहा।

मिल्खा सिंह का सपना पूरा करने वाला ये लड़का अपनी ट्रेनिंग खुद करके आया। हालांकि उनके पास अब इंटरनेशनल सतर के कोच हैं लेकिन कहानी और संघर्ष वो होता है जो अभाव के बीच आकार पाता है और सफलता के बाद हर कोई चाव से सुनाता है और प्रेरणा हासिल करता है।

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