कछुआ से केवट और सुदामा, प्रेरणादायक कहानी

एक कछुआ भगवान विष्णु का बड़ा अनन्य भक्त था. एक बार गंगासागर स्नान को आए कुछ ऋषियों के मुख से उसने श्रीहरि के चरणों की महिमा सुनी।

कछुए के मन में प्रभु चरणों के दर्शन की तीव्र इच्छा हुई.
उसने ऋषियों से पूछा कि उसे प्रभु चरणों के दर्शन कैसे हो सकते हैं. ऋषियों ने बताया कि प्रभु के चरणों के दर्शन का सौभाग्य उन्हीं पुण्यात्माओं को मिलता है जिन पर वह प्रसन्न होते हैं।

कछुए पूरी निष्ठा से प्रभु की भक्ति करता था. लेकिन उसे यज्ञ-हवन आदि तो करने आते नहीं थे, इसलिए उसे लगा कि उसकी भक्ति तो पूरी है नहीं. लेकिन जंतु रूप में तो श्रीहरि ने ही भेजा है, इसलिए मेरी क्या गलती! उसने ऋषियों से पूछा कि प्रभु कहां वास करते हैं? ऋषियों ने कहा- वैसे तो प्रभु सब जगह हैं लेकिन उनका निवास पाताल लोक से भी आगे बैकुंठधाम में है. क्षीर सागर में वह शेषनाग की शय्या पर विराजते हैं.कछुआ चल पड़ा श्रीहरि के धाम.

एक तो बेचारा ठहरा कछुआ – कछुए की चाल से ही चल पड़ा | चलते चलते – चलते चलते …. सागर तट तक भी पहुँच ही गया – फिर तैरने लगा, बढ़ता गया, बढ़ता गया ….

और आखिर पहुँच गया वहां जहां प्रभु शेष शैया पर थे – शेष जी उन को अपने तन पर सुलाए आनन्द रत थे और लक्ष्मी मैया भक्ति स्वरूप हो प्रभु के चरण दबा रही थीं।

कछुए ने प्रभु चरण छूने चाहे – पर शेष जी और लक्ष्मी जी ने उसे ऐसा करने न दिया – बेचारा तुच्छ अशुद्ध प्राणी जो ठहरा (कहानी है – असलियत में प्रभु इतने करुणावान हैं – तो उनके चिर संगी ऐसा कैसे कर सकते हैं? )बेचारा – उसकी सारी तपस्या – अधूरी ही रह गयी।

प्रभु सिर्फ मुस्कुराते रहे – और यह सब देखते नारद सोचते रहे कि प्रभु ने अपने भक्त के साथ ऐसा क्यों होने दिया?

फिर समय गुज़रता रहा, एक जन्म में वह कछुआ केवट बना – प्रभु श्री राम रूप में प्रकटे, मैया सीता रूप में और शेष जी लखन रूप में प्रकट हुए।

प्रभु आये और नदी पार करने को कहा – पर केवट बोला ……….. पैर धुलवाओगे हमसे , तो ही पार ले जायेंगे हम , कही हमारी नाव ही नारी बन गयी अहिल्या की तरह , तो हम गरीबों के परिवार की रोटी ही छीन जायेगी।

फिर शेष जी और लक्ष्मी जी के सामने ही केवट ने प्रभु के चरण कमलों को धोने, पखारने का सुख प्राप्त किया …

समय गुज़रा….कछुआ अब सुदामा हुआ – प्रभु कान्हा बने , मैया बनी रुक्मिणी और शेष जी बल दाऊ रूप धर आये
दिन गुज़रते रहे – और एक दिन सुदामा बना वह नन्हा कछुआ – प्रभु से मिलने आया।

धूल धूसरित पैर, कांटे लगे, बहता खून, कीचड़ सने …………..

फिर क्या हुआ?
प्रभु ने अपने हाथों अपने सुदामा के पैर धोये , रुक्मिणी जल ले आयीं, और बलदाऊ भी वहीँ बालसखाओं के प्रेम को देख आँखों से प्रेम अश्रु बरसाते खड़े रहे ….

हरि अनन्त , हरि कथा अनंता

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