दुबई पानी का इंतजाम ऐसे कर रहा है ? कैसे बन रही है Artificial Rain

दोस्तों दुबई को दुनियां में ऐशो आराम और शानो शौकत का दूसरा नाम माना जाता हैं लेकिन क्या आपको मालूम हैं ! यहां हर तरह की सुख सुविधाओं से भरा हुआ दुबई अंदर से पूरी तरह सूखा हुआ हैं ! असल में दुबई पूरा रेगिस्तान पर बसा हुआ हैं !

जिसके कारण वहां पीने के पानी का कोई भी प्राकृतिक स्रोत मौजूद नहीं हैं और इसीलिए दुबई पीने के पानी का इंजाम करने के लिए क्लोसेरीन नाम की एक टेक्नोलॉजी की मदद लेता हैं और आज की हमारी इस  में भी हम आपको यही बताने वाले हैं की दुबई आखिर इस टेक्नोलॉजी की मदद से अपने लिए पानी का इंतजाम किस तरह से करता हैं और साथ ही आपको यह भी समझायेंगे की आने वाले समय में यह टेक्नोलॉजी हमारे भारत के लिए एक बहुत बड़ा खतरा कैसे बन सकती हैं !

दोस्तों दुबई यूनाइटेड अरब अमीरात यानि की युवे के साथ अमीरातों में से एक हैं ! इस शहर को दुनियां के सबसे मशहूर और सबसे महंगे शहरों में शुमार किया जाता हैं क्योंकि इस शहर का अपना एक ऐसा आकर्षण हैं की दुनियां भर के लोग इसके तरफ खींचे चले आते हैं लेकिन ऊपर से खुशहाल और संपन्न नजर आने वाला ये शहर अंदर से पूरी तरह सूखा हुआ हैं ! दरअसल दुबई एक सूखे हुए रेगिस्तान के ऊपर बसा हुआ हैं !

जहाँ पीने के पानी का एक कतरा भी मौजूद नहीं हैं और तो और यहां बारिश भी पुरे साल में सिर्फ 5 से 10 बार ही होती हैं ! जोकि दुबई में पानी की समस्या को हल करने के लिए काफी नहीं हैं ! अब वैसे तो समुद्र के किनारे बसा होने के कारण दुबई के पास पानी की कोई कमी नहीं लेकिन समुद्र का पानी खारा होता हैं ! जिसके चलते इसको पिया नहीं जा सकता और अगर कोई इंसान इस खारे पानी को लगातार पी ले तो फिर इससे उसकी मौत भी हो सकती हैं ! अब सवाल आता हैं की दुबई आखिर पीने के पानी का इंतजाम किस तरह से करता हैं !

असल में दोस्तों दुबई के अंदर पानी को शुद्ध करने वाले बहुत से बड़े बड़े डी डेलीगेशन प्लांट बनाये गए हैं और इन प्लांट्स के अंदर समुद्र के खारे पानी से नमक को दूर करके उसको पीने के लायक बनाया जाता हैं लेकिन ये प्रोसेस सुनने में जितना आसान लगता हैं ! असल में उससे कही ज्यादा काम्प्लेक्स हैं क्योंकि ये दिन रात चलने वाली इन ब्रांड्स को बेशुमार ऊर्जा की जरुरत पड़ती हैं ! जिसके चलते इनको चलाने का खर्चा बहुत ही ज्यादा हो जाता हैं ! एक आंकड़े के अनुसार इन प्लांट्स में 1000 लीटर पानी को फ़िल्टर करने का खर्चा 60 डॉलर यानि की लगभग 44 सौ रुपये तक का होता हैं !

अब जाहिर सी बात हैं की पानी के लिए इतना ज्यादा खर्चा झेलना किसी भी सरकार के बस की बात नहीं हैं इसीलिये दुबई सरकार भी किसी ऐसे सलूशन की खोज कर रहे थे ! जोकि इन्हे इस खर्चे से बचा सके और फिर दुबई को यह सलूशन क्लाउड सीडिंग टेक्नोलॉजी के रूप में प्राप्त हुआ ! अब आप में से बहुत सारे लोग क्लाउड सीडिंग के बारे में पहले से ही जानते होंगे लेकिन जो लोग नहीं जानते उन्हें हम बता दे की इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल आर्टिफीसियल रिंग यानि की प्रत्यन रूप से बारिश करवाने के लिए किया जाता हैं !

अब दुबई इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अपने पानी के समस्या को दूर करने के लिए कैसे करता हैं और ये टेक्नोलॉजी आखिर किस तरह से काम करती हैं ! इसको समझने के लिए चलिए पहले हम आपको बारिश होने का बेसिक कांसेप्ट बताते हैं ! दोस्तों सूरज की किरणे जब पृथ्वी की सतह पर मौजूद पानी पर पड़ती हैं ! तो फिर वह पानी भांप बनकर ऊपर उठने लगता हैं और जोकि ऊपर का टेम्परेचर ठंडा होता हैं ! इसीलिये यह भांप ऊपर जाकर फिर से पानी की छोटी छोटी बूंदो के रूप में बदल जाती हैं और पानी की इन बेहद छोटी बूंदो को अंग्रेजी भाषा में ड्रॉप्लेट्स कहा जाता हैं !

जोकि पानी की PURES FOM होती हैं ! पानी की ये ड्रॉप्लेट्स ऊपर इकठ्ठा होकर बादलों का रूप ले लेते हैं साथ ही बेहद छोटी होने की वजह से यह बहुत ज्यादा हल्की भी होती हैं और यह नीचे जमीन पर तब तक नहीं गिरती जब तक की ये आपस में जुड़कर बड़ी बूंदों का रूप न धारण कर ले ! अब जोकि ये पानी की PURES FOM होती हैं इसीलिये ये एक दूसरे के साथ जुड़ती भी नहीं हैं लेकिन जब इन ड्रॉप्लेट्स के धुंए या फिर धूल के कड टकराते हैं तो फिर ये PUREST FOM में नहीं रह जाती हैं और एक दूसरे के साथ जुड़ने शुरू हो जाते हैं और फिर जैसे ही इनका वजन बढ़ता हैं

तो फिर ये बूंद के रूप मर ग्रेविटी की वजह से नीचे जमीन पर गिरने लगती हैं ! जिसको की हम लोग बारिश कहते हैं ! तो दोस्तों यह था प्राकृतिक रूप से बारिश होने का बेसिक कांसेप्ट ! अब अगर क्लाउड सीडिंग की बात करें तो इस टेक्नोलॉजी को साल 1946 में अमेरिकी वैज्ञानिक वेंसन सेफर के द्वारा DEVELOP किया गया था !बेसिकली यह एक ऐसे टेक्नोलॉजी हैं ! जो बादलों में मौजूद छोटे छोटे ड्रॉप्लेट्स को आपस में जोड़ने का काम करती हैं और जैसा की हमने आपको बताया की जब पानी की ड्रॉप्लेट्स आपस में जुड़ते हैं तो फिर बारिश होने शुरू हो जाते हैं !

दरअसल इस टेक्नोलॉजी में सिल्वर आयोडाइड नाम का एक रसायनिक कंपाउंड बादलों के ऊपर छिड़का जाता हैं और इसको छिड़कने के लिए या तो प्लेन काइस्तेमाल किया जाता हैं या फिर ये जामीन से भी स्पेशल किस्म के जगनेटर के द्वारा बादलों में भेजा जाता हैं ! अब ये रसायनिक कंपाउंड जब बादलों में जाता हैं ! तो फिर ये छोटे छोटे ड्रॉप्लेट्स को आपस में जोड़कर बड़ी बूंदो में बदल लेता हैं ! जिससे की बारिश होने शुरू हो जाती हैं और इसीलिये कह सकते हैं की क्लाउड सीडिंग एक ऐसी टेक्नोलॉजी हैं ! जोकि बादलों को बारिश करने के लिए FORCE करती हैं और इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कई दर्शकों से सफलतापूर्वक किया भी जा रहा हैं और आज इसकी मदद से सिर्फ बारिश ही नहीं बल्कि आर्टिफीसियल रूप से बर्फबारी करना भी संभव हो चूका हैं !

तो चलिए दोस्तों अब हम आपको बताते हैं की दुबई आखिर क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल किस तरह से करता हैं ! दरअसल दुबई सरकार ने हजर के पहाड़ो में हट्टा नाम का एक डैम बनवाया हैं और जब समुद्र से उठने वाले बादल हजर के पहाड़ो में जाते हैं ! तब दुबई उन बादलों में क्लाउड सीडिंग करता हैं और जब इस क्लाउड सीडिंग से पहाड़ों पर बारिश होती हैं !

तो बारिश का वो पानी पहाड़ो के नीचे बहते हुए समुद्र में जाने की वजाय इस डैम के अंदर जमा हो जाता हैं और फिर इस जमे हुए पानी का इस्तेमाल दुबई न सिर्फ पीने के लिए करता हैं ! बल्कि इसके जरिये बिजली का निर्माण भी किया हैं ! अब जहां डी डेलीगेशन प्लांट में 1000 लीटर पानी को फ़िल्टर करने का खर्चा 44 सौ रुपये के आस पास आता था ! वही आज क्लाउड सीडिंग की मदद से यह काम सिर्फ और सिर्फ 70 से 75 रुपये में हो जाता हैं और इस तरह से दुबई आधुनिक टेक्नोलॉजी की मदद से अपने यहां पीने के मीठे पानी का इंतजाम करता हैं !

जोकि वाकई में अदभुत हैं ! दोस्तों क्लाउड सीडिंग बहुत ही उपयोगी टेक्नोलॉजी हैं ! जिसका इस्तेमाल दुबई की तरह ही दुनियां के और भी कई हिस्सों मे अच्छे कामो में लिए किया जा रहा हैं लेकिन इसकी एक सबसे बड़ी खामी यह हैं की इसका इस्तेमाल हथियार के रूप में भी किया जा सकता हैं ! आपके जानकारी के लिए बता दें की साल 1955 से 1975 के बीच लड़े गए वियतनाम युद्ध में अमेरिका ने वियतनाम के खिलाफ क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया था ! दरअसल अमेरिका के सिपाही हर साल मानसून के सीजन के दौरान वियतनाम के बादलों में क्लाउड सीडिंग करते थे !

जिससे वहां पर ताबड़तोड़ बारिश आने की वजह से भयंकर बाढ़ की समस्याएं बढ़ जाती थी और इस बाढ़ की वजह से सारे रास्ते जाम हो जाते थे ! जिससे की वियतनाम के मिलेट्री SUPPLY पूरी तरह से ठप पड़ जाती थी ! अमेरिका ने अपने इस ओपरेशन को ओपरेशन को पाय नाम दिया था ! अब या तो अमेरिका इस हथियार का निशाना सिर्फ वियतनाम सिपाहियों को ही बनाना चाहता था लेकिन इसके इस्तेमाल से बहुत सारे बेगुनाह लोग भी मारे गए थे और इसीलिये साल 1976 में ENVIRONMENTAL . MODIFICATION . CONVENTION नाम की एक संधि बनाई गयी थी ! जिसमें की यह तय किया गया की भविष्य में कभी युद्ध के दौरान इस तरह के हथियार का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा और इस संधि में कुल 78 देशों ने शाइन किया था !

जिसमें की भारत ,पाकिस्तान , चीन , अमेरिका , जापान जैसे देशों के नाम शामिल हैं ! दोस्तों आखिर में हम बात करते हैं की क्लाउड सीडिंग टेक्नोलॉजी भारत के लिए नुकसान दायक कैसे साबित हो सकती हैं !

असल में भारत के इस डर की वजह कोई और नहीं बल्कि हमारा पडोसी देश चीन हैं क्योंकि चीन का यह कहना हैं की वे WEATHER मॉडिफिकेशन की एक ऐसी एडवांस टेक्नोलॉजी को बनाने पर काम कर रहा हैं ! जिससे की साल 2025 तक वह अपने एक तिहाई देश के मौसम को पूरी तरह से अपने कंट्रोल में ले लेगा और इस टेक्नोलॉजी को लेकर चीन इतना ज्यादा सीरियस हैं की इसकी सिर्फ रिसर्च पर ही वह 10 हजार करोड़ से भी ज्यादा खर्च कर चूका हैं !

अब एक्सपर्ट्स की माने तो उनका कहना हैं की अगर चीन अपने इस प्रोग्राम में सफल हो जाता हैं तो उसकी WEATHER कण्ट्रोल करने का नेगेटिव इफ़ेक्ट हमारे भारत के कश्मीर और कई सारे हिस्सों में देखने को मिल सकता हैं ! इसके अलावा अनुमान यह भी हैं की अगर चीन के हाथ में मौसम का अपना कण्ट्रोल आ गया तो फिर भारत के जो हिस्से चीन के बॉर्डर से सटे हुए हैं ! वहां पर चीन अपनी मर्जी से जितनी चाहे उतनी बारिश करवा सकता हैं ! या फिर रुकवा भी सकता हैं लेकिन दोस्तों सभी को यह याद रखना चाहिए की इतिहास गवाह हैं !

इंसानों ने जब भी प्राकृतिक के साथ छेड़ छाड़ करने की कोशिश की हैं तो फिर उसके बहुत भयंकर परिणाम सामने आये हैं ! ऐसे में चीन का इतने बड़े लेवल में मौसम को अपने कण्ट्रोल में लेना बहुत ही ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता हैं और क्या पता चीन के ऐसा करने का खामियाजा हमारे देश को भी चुकाना पड़ जाए ! तो दोस्तों यह थी क्लाउड सीडिंग और उससे सम्बंधित जानकारियां !   आपका बहुमूल्य समय देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.