सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल 21 साल की उम्र में पाकिस्तान को धूल चटवा दी अकेले ने

ये बात है 1971 की जब भारत में युद्ध के बादल मडराने लगे थे। और इंडियन मिलिटरी फ़ोर्स पूरी तरीके से हाई अलर्ट पर थी और जब 3 दिसम्बर 1971 के शाम को जब पाकिसतानी एयर फोर्स ने इंडियन एयरफॉल ने स्ट्राइक लॉन्च की थी भारत ने तुरंत इसके जवाब में 4 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तान के खिलाफ औपचारिक रूप से युद्ध का एलान कर दिया।

और जब 1971 का युद्ध शुरू हुआ था। तब उस समय अरुण खेतरपाल इंडियन आर्मी में एक नई सेकंड लेकुरलेंड के तौर पर हुए थे और अरुण खेतरपाल एक ऐसी फॅमिली से विलोग करते थे जिनका इंडियन आर्मी में सर्विस देने का काफी लम्बा ट्रेडिशनल था। क्युकी इनके ग्रांडफादर ब्रिडेयर इंडियन आर्मी के तहत प्रथम विश्वयुद्ध बाद ले चुके थे और जबकि इनके फादर ब्रिडेयर m .l खेतरपाल इंडियन आर्मी की इंजीनियर की कोच में सर्विस दे रहे थे।

और इसी लिए इसमें कोई ताजुब वाली बात नहीं हैं कि अरुण खेतरपाल बचपन से ही इंडियन आर्मी को ही जॉइन करने के सपने देखा करते थे। और तेज के प्रति एक गहरी तेज भक्ति की भावना उनके खून में थी। लेकिन 14 अक्टूबर 1950 को पुणे में जन्मे इस लड़के के बारे में कभी किसी ने नहीं सोचा होगा। कि ये इतना बड़ा कारनामा करक के दिखाएगा।

अरुण खेतरपाल ने संवर प्रेस्टीजियस डोरेंस के स्कूल अपनी स्कूलिंग काम्पलेट कर के 1967 में एनडीए में दाखिला लिया था। और वे 3 जून 1971 को इंडियन आर्मी के 17 पुणे हॉर्स में कमिसइनेड हुए थे। और आर्मी में कमिसइंड होने के 6 महीने बाद ही वो भारत और पाकिस्तान के बिच 1971 का युद्ध छिड़ गया था उस समय अरुण खेतरपाल की रेजिमेंट को ऑडर दिय गए।

कि वे सकल घर सेक्टर के पास बसंतर नदी के पास एक ब्रिज ऐड को स्थापित करे क्युकी बसंतर नदी एक ऐसी जगह थी। जो पाकिस्तानी ब्रिज के काफी करीब थी और ये रांडेतिक रूप से दोनों देशो के लिए बहुत जय्दा मह्त्वपूण थी.क्युकी इसमें जम्बू से पंजाब तक के सभी रोड़ रेलवेलिंक आते थे। और अगर पाकिस्तान इस लिंक को कट करने में कामयाब हो जाता।

तो फिर जम्बू कश्मीर अमृतसर पठानकोट और गुरदास पूर्ण जैसी कई मह्त्वपूण एरिया खतरे में पड़ सकते थे उस समय अरुण खेतरपाल की रेगुरमेंट 47वी इन्फेन्ड्री बिगेन की कमांड के तहत आती थी जिस सेब्लैक ऐरो के नाम से भी जाना जाता था। लेकिन इस बसंतर नदी में कब्जा करवाना काफी जयदा मुश्किल था क्युकी पाकिस्तान ने कश्मीर को पंजाब से कातमे के लिए सकरपुर बजल में बसंतर नाडु में अपनी शक्ति को इतना मजबूत कर लिया था।

की ये लगभग एक अजयदुर के साथ लग रहा था लेकिन अखनूर के इलाके में लड़के भारतीय सेना को आगे बढ़ना बहुत मुश्किल था और इसके लिए भारतीय सेना के पास केवल एक ही उपाय था। कि वे बसंतर नदी को पार कर के पाकिस्तान की सिमा में घुस कर सिदा शत्रु सेना पर हमला करे। 1971 की लड़ाई में बसंतर की जंग में पाकिस्तान के पास पांच बटालियन थी।

हिन्दुस्तान के पास केवल तीन बटालियन थी। और भी कई कारण थे। जसकी वजा से पाकिस्तान का पर्णक काफी जय्दा भारी लग रहा था। लेकिन तीन टेंको से साथ 17 पुन हॉर्स के सेकुंड लेफ़िलेंड के अरुण खेतरपाल को सामने से रहे 14 पाकिस्तान पेडिटेन्स की कि कतार को रोकने कि जिमेदारी सौंपी गए और महक 21 साल का ये लड़का सामने से सकवॉन्डर रहे बिड गया लेकिन अरुण खेतरपाल के बाकि के दो टेंक के कमांडर कारण मल्होत्रा और लेन्थर अलवार बहुत बुरी तरह से चकने हो गए थे

. और इसके बाद अब इस नेतृत की जिमेदारी केवल इस 21 साल के नौजवान अरुण खेतरपाल पर आए गयी थी और तब तक 21 साल के सेकड नेतृत अरुण खेतरपाल ने दुश्म की शैल से हिट होने से पहले पाकिस्तान के पांच टेंको को अलेके ही तबा किया था। लेकिन पांच टेंको को तबा करने के बाद अरुण खेतरपाल को भी एक शैल हिट कार चूका था। और वे भी पूरी तरह से चकनी हो गए थे। और उनके टेंक पूरी तरह से काम नहीं कर रहा था। लेकिन उनके टेंक की गन अभी भी इतनी अछि हालत में थी कि वो पूरी तरकीके से काम कर रही थी।

और तब अरुण खेतरपाल के कमांडर ने उन्हें निर्देश दिए थे कि वे वापिस जाए। लेकिन अरुण खेतरपाल ने वापिस आयने से मना कर दिया। लेकिन उन्होंने ऑफिसर से कहा कि सर में टेंक को नहीं छोड़ूगा क्युकी मेरे टेंक की गन अभी भी फायर कर रही है। और जब तक ये काम करते रहेगी। में फायर करता रहुगाऔर ये कहने के बाद उन्होंने ट्रांसमीटर को स्विचऑफ कर दिया।

ताकि उन्हें टेंक कोछोड़ने वाले ऑडर मिले और फिर इसके बाद शहीद होने से पहले उन्होंने पाकिस्तान के दो और टेंक को बुरी तरिके से दवस कर दिया था जब पाकिस्तान ने देखा कि उनके 10 टैंक खत्म हो चुके है तो से सिर्फ सेना का आगे पड़ा रूप दिया बल्कि उनका मनोहर तो इतना गिर गया।

कि वे आगे बढ़ने से पहले दूसरी बटालियन की मांग करने लगे और अरुण खेतरपाल किसी बीरता की वजा से इंडियन आर्मी बसंतर बेटल को जितने में कामयाब रही और जब तक पाकिस्तानी आर्मी को समझ पाती तब तक इंडियन आर्मी उनकी टेरटरी में घुस चुकी थी और उनको तबा कर चुकी थी। और फिर उस समय पकिस्तानी आर्मी के पास सलेंडर करने के अलावा कोई और दूसरा रास्ता नहीं था।

और फिर इस युद्ध के पास 16 दिसंबर 1971 को सेकंड लेंड अरुण खेतरपाल को मरनुप्राण भारत के सबसे हाइएस कलेट्री अवार्ट पर्म वीरचक्र से समानित किया गया ओर्स युद्ध में हमारे करीब 7 ऑफिसर 4 जूनियर कमीशन ऑफिसर और 24 सिफाई शहीद हुए थे। जिनमे सेकंड डेफिनेंट अरुण खेतरपाल भी शामिल है।

और अब अरुण खेतरपाल की बहादुरी का अंदाज़ा इस बात से लगा सकते है खुद पाकिस्तान के डिफेंट वेबसाइट पर अरुण खेतरपाल की बहादुरी की कहानी को जगह दी और यह तक की पाकिस्तान के परिगेडिय ने खुद अरुण खेतरपाल की बहादुरी का लोहा मन था। क्युकी ये पाकिस्तान के वही ऑफिसर है जिन्होंने अरुण खेतरपाल का युद्ध भूमि में सामना किया था।

और एक अनुमानित अकड़े के मुताबिक इस युद्ध में भारत के 10 टेंक तबा हुए थे और जबकि पाकिस्तान के 46 टेंक को तबा किया था। इन में से 60 टेंको को अरुण खेतरपाल ने अकेले ही तबा कर दिया था। और ये बात बिलकुल सच है की अरुण खेतरपाल जैसे वीर बहादुर सिफाई रोज़ जन्म नहीं लेते है। और हम बहुत खुश किस्मत है कि हम एक ऐसे देश के निवासी है जहा के इतने वीर बहादुर योदा ने जन्म लिया है और हम अरुण खेतरपाल के इस बादुरि को दिल से सलाम करते है। और हम इनके सर्वोच्च बलिदान के लिए सदा के ऋणी रहेंगे।

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