दिलीप कुमार उर्फ युसूफ खान आज हमारे बिच नहीं रहे उनकी कुछ अनसुनी बाते देखिये

दिलीप वह महान एक्टर हैं, जिन्हें इंट्रोडक्शन कि बिलकुल जरुरत नहीं है। इसलिए मैं आपको बताऊंगी। जी ने शायद आप नहीं जानते। दिलीप कुमार उर्फ युसूफ खान का जन्म 11 दिसंबर, 1922 को पेशावर में हुआ जो कि आज पाकिस्तान का हिस्सा है। जानकर आपको हैरानी होगी।

हिंदी सिनेमा के शो मैन राजकपूर और दिलीप साहब बचपन के दोस्त थे। दोनों ने एक ही स्कूल में पढ़ाई भी की थी। 17 साल में पिताजी के साथ लड़ाई हुई और वह पुणे आ गए होने के बाद उन्होंने एक कैंटीन के बाहर सैंडविच स्टॉल लगाया और कमाना शुरू कर दिया। जब यह काम शुरू किया तब उन्होंने किसी को बताया नहीं कि वह अमीर घराने से आए हैं।

उनके पिताजी का व्यापार केंद्र पेशावर और देवलाली हुआ करता था। उस वक्त की महान एक्ट्रेस और मुंबई टॉकीज की मालकिन देविका रानी की नजर दिलीप साहब पर पड़ी। उनकी उर्दू और इंग्लिश की समझते कर देविका रानी ने दिलीप साहब को मुंबई टॉकीज में स्क्रिप्ट राइटर के तौर पर रखा।

देविका रानी के कहने पर उन्होंने 1944 की फुल ज्वार भाटा में पहली बार एक्टिंग की। साथ ही उन्होंने अपना नाम युसूफ खान से बदलकर दिलीप कुमार कर लिया। नाम बदलने की सलाह उन्हें देविका रानी नहीं दी थी शायद गलती हो सकती है पर एक वक्त ऐसा भी आया था जब उन्हें हॉलीवुड की फिल्म ऑफर हुई थी और दिलीप साहब ने उस फिल्म में काम करने से मना कर दिया।

फिल्म का नाम थालोन्स ऑफ़ अरेबिया और इसी फिल्म को 1963 में सबसे ज्यादा ऑस्कर अवार्ड मिले थे और जिस कार्य के लिए डायरेक्टर डेविड दिल्ली ने दिलीप कुमार को कम किया था उसका रेट सिर के लिए भी बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर कौन नॉमिनेशन मिला था कि शुरुआत में हुई और दिलीप कुमार जी ने सबसे पहली बार फिल्म फेयर बेस्ट एक्टर का अवार्ड दिया गया।

यह अवार्ड उन्हें 1952 की सुपरहिट फिल्म दाग के लिए मेला फिल्म फेयर बेस्ट एक्टर। यह रिकॉर्ड महानायक अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान से भी नहीं टूटा है। फिर कुमार अकेले आते थे जो सबसे ज्यादा फीस लेते थे। बताया जाता है कि वह करीब करीब ₹100000 लेते थे। अगर इनकी तुलना आज की जाए तो 50 करोड़ लेने वाले एक्टिंग के गॉड यानी कि रजनीकांत से तुलना हो सकती है।

इसमें उन्हें प्राचीन कहा जाने लगा और दिलीप साहब की डिप्रेशन के पीछे भी यही वजह थी। दिलीप कुमार अशोक कुमार को अपना गुरु मानते थे। एक इंटरव्यू में दिलीप साहब ने कहा था कि तुम नेचुरल एक्टिंग किया करो जब ऑल इंडिया सुपर स्टार राजेश खन्ना की एंट्री हुई।

तब दिलीप साहब की फिल्में फ्लॉप होने लगी थी इसलिए उन्होंने 5 साल तक कोई काम नहीं किया पर उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जब 1981 में उन्होंने एंट्री ली तो एक बार फिर से अपना जादू पेश कर दिया। पर इस बार दिलीप साहब जो सिर्फ कार्य के रोल निभाने शुरू किए थे।

क्रांति शक्ति मशाल धर्म अधिकारी कानून अपना अपना सौदागर किला यह वह फिल्में हैं, जिनमें दिलीप साहब ने कैरेक्टर रोल निभाया और आज भी फिल्में टीवी पर चलाई जाती है तो लोग बड़े ही । प्यार से देखते हैं।
1960 की ऐतिहासिक फिल्म mughal-e-azam दिलीप कुमार की आज तक की सबसे ज्यादा कमाने वाली फिल्म है।

सुनकर आप हैरान हो जाएंगे। दिलीप साहब ने एक इंडियन एक्टर के रूप में सबसे ज्यादा अवार्ड जीतने का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है। हालांकि गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड आशा भोसले कुमार, सानू, समीर, अंजान रितिक रोशन सुनील दत्त जगदीश राज ने भी बनाया है। उनकी 1967 फिल्म राम और श्याम ने डबल रोल कार्य का इतिहास बदल दिया।

इस फिल्म में दिलीप साहब ने डबल रोल का कैरेक्टर निभाया था। कहानी यह थी राम और श्याम नाम की जुड़वा भाई हैं जो बचपन में ही अलग हो जाते हैं और बड़े होने के बाद मिल जाते हैं। हिंदी सिनेमा में यह प्लॉट आज भी यूज़ किया जाता है कि चाय तो सबको पता ही होगा कि उनका पहला प्यार मधुबाला थी।

इन दोनों की लव स्टोरी 7 साल तक चली एक डोर ऐसा भी आया जब एक साथ सेट पर होते हुए भी दोनों एक दूसरे से बात नहीं किया करते थे। Mughal-e-azam की शूटिंग के वक्त डायरेक्टर के आसिफ दोनों को बहुत समझाते थे पर दोनों ने एक साथ ना रहने का फैसला ले लिया था। इस फिल्म में जो सबसे रोमांटिक सीन है, वह इसी हालात में शूट हुआ था। मधुबाला से अलग होने के बाद दिलीप साहब की जिंदगी में सायरा बानो आए और 1956 में उन्होंने शादी कर ली।

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