इस वजह से 81 साल के बुजुर्ग Dalai Lama से घबराता है China

दोस्तों एक 81 साल के बौद्ध दलाई लामा से आखिर चीन क्यों डरता हे इसकी सच्चाई आज आपको में इस  में दिखाऊंगा दोस्तों बौद्ध धर्म में भगवान बुद्ध के बाद आज अगर सबसे ऊंचा स्थान हे तो वो हे दलाई लामा का हे ! बौद्ध धर्म के लोग दलाई लामा को भगवन के रूप में देखते हे

हालाँकि चीन तिब्बत में लोगो की आस्था के प्रति हमेशा से दखल देता रहा हे लकिन भारत ने हमेशा तिब्बती बौद्धों का सम्मान करते हुए उनका समर्थन करता आया हे हालाँकि दलाई लामा की जब भी बात होती हे चीन चौकन्ना हो जाता हे लामा जिस भी देश में जाते हे

चीन को उनकी आपत्ति से दो चार होना पड़ता हे। लकिन सवाल ये हे की आखिर दलाई लामा से चीन क्यों डरता हे इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमे तिब्बत के इतिहास में झाकना होगा इसकी शुरुआत होती है। 1409 से 1409 में जे सिखांपा ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जेलग स्कूल की स्थापना की।

यह जगह भारत और चीन के बीच थी, जिसे तिब्बत नाम से जाना जाता है। जेलक एक स्कूल के सबसे चर्चित छात्र का नाम था। गेंदुन द्रूप !! गेंदुनआगे चलकर पहले दलाई लामा बने दलाई। लामा को मुख्य रूप से शिक्षक के तौर पर देखा जाता है।

लामा का मतलब गुरु होता है जो अपने लोगों को सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते हैं। 1630 के दशक में तिब्बत का एकीकरण होना शुरू हुआ तो बोद्धो और तिब्बती नेतृत्व के बीच लड़ाई शुरू हुई। पांचवी दलाई लामा ने तिब्बत को एक करने में कामयाबी पाई जिसके बाद से तिब्बत सांस्कृतिक केंद्र के रूप में उभरा और पूरी दुनिया में प्रस्तुति पायी ।

1912 में तेरहवे दलाई लामा ने तिब्बत को स्वतंत्र घोषित किया। और करीब 40 साल बाद चीन ने तिब्बत पर आक्रमण किया और अपने में मिला लिया। जिस वक्त चीन का यह आक्रमण हुआ था उस वक्त 14वें दलाई लामा को चुनने की प्रक्रिया चल रही थी।

चीन के आक्रमण के कुछ सालों बाद अपनी स्वतंत्रता के लिए तिब्बती लोगों ने विद्रोह कर दिया। विद्रोह को चीन द्वारा कठोरता से दबाया गया। जब चीन ने विद्रोह को दबाया को दलाई लामा भागकर भारत आ गए। चीन दलाई लामा का भारत में शरण लेना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा,

जिसकी वजह से एक भारत और चीन के बीच तनाव भी बड़ा। चीन आज भी लामा को अलगाववादी नेता मानता है। चीन को डर है की दलाई लामा की वजह से तिब्बत में फिर विद्रोह भड़क सकता है। यही नहीं चीन इस बात से भी डरता है कि कहीं लामा चीनविरोधी का केंद्र बनकर कर दुनिया को उसके खिलाफ खड़ा ना कर दे।

भारत में लामा को धार्मिक गुरु के तौर पर शरण ली हुई है। लेकिन दुनिया उनकोतिब्बत के नेता के तौर पर ही पहचानती है। ऐसे में जैसे ही दलाई लामा का नाम आता है। चीन के कान खड़े हो जाते हैं और वह वहां की सरकारों से आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताता है।

हालाँकि दलाई लामा साफ कर चुके हैं कि अब वह तिब्बत की आजादी की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि अर्थ पूर्ण स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं अगर बात करे आज की तो प्रधानमंत्री मोदी कई सालो से दलाई लामा के संपर्क में हे और दलाई लामा जब भी भारत का दौरा करते हे तो चीन की सांसे फूल जाती हे

अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 6 जुलाई को दलाई लामा को उनके जन्मदिन पर ट्वीट कर बधाई दी और लिखा की मेने दलाई लामा से फ़ोन पर बात की हे और उन्हें उनके 86 वे जन्मदिन पर बधाई दी हे हम उनके लम्बे और स्वस्त जीवन की कामना करते हे लकिन दोस्तों जानकारों का मानना हे की चीन दलाई लामा के मरने का इंतजार कर रहा हे

ताकि वो एक कठपुतली को वहां बिठा सके। दरअसल चीन के खिलाफ दुनिया के कई देशों के साथ साथ मोदी ने भी बड़ा बदलाव किया हे। दोस्तों इसके बारे में आपके क्या ख्याल हे कमेंट जरूर कीजियेगा और  लाइक शेयर जरूर कीजियेगा धन्यवाद।

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